25 February 2017

THE COCOON......!!

We born, we crawl, v grow, we connect,
v start understanding, then v become mature or sometimes not.
If mature then pushed, pushed enough to handle .
Yes to handle the uncertainties,
some time estimated and mostly surprised.

In both the cases v mortals  have been thought
to become perfect to fight ,not to surrender, not to give up,
not to cry, not to express, not to be the one we are
but to be the one we are not.
Is that the definition of living?
or may be the definition of surviving?

M confused or is that an art of survival for living?
V human are just a living thing, waiting to die someday.
Oohh wait..!! no no that's not possible
I guess v have forgotten that v r not immortal.

All these thoughts are flowing inside since I have visited a funeral of my closed one.

I often think where do we want to reach ? what are we chasing?

I guess I know we always want to be in a cocoon of comfort followed by a sequel of betray, conspiracy, exploitation, revenge, obsession and the acts of selfishness.

But in real we are chasing our own deed what an irony, isn't it??

2 December 2015

एक दिन यूँ ही...!!!

रिश्तों के अर्थ बदल जाते हैं
कभी समझी न ये की कैसे बदलते हैं
पर सच है की बिलकुल बदल जाते हैं। 

एक दिन यूँ ही कुछ सवाल सा कौंधा  की
मेरे घर से निकलती है एक पगडण्डी
जो सड़क से जा कर के मिली है
पहली दफ़ा जब चली थी लगा, कहाँ ले चली है ?
पर भरोसा दिलाया जब सड़क से मुझको मिलाया

कई मौसम गुज़रे , कई गड्ढे भी खुद गए
पर  उस पगडण्डी ने फिर भरोसा दिलाया
और हर बार सड़क से मुझको मिलाया

अदभूत है न। .... इतनी कठिनाइयां आयीं होंगी 
हम तुम तो फिर भी बदले पर बरसों से बनी ये पगडण्डी
इसके अर्थ कभी भी क्यों ना बदले ??

परन्तु मनुष्य का स्वाभाव ही यही है
कहते हैं जिज्ञासी बड़ा है ,खुद पर घमण्ड  भी बड़ा है
अपने सुख सुविधा स्वरुप
रिश्तों केअर्थ को भी दिया है इसने कई सारे रूप
कपटी है और है बहुत कुरुप
चयन करता है अपने लाभ स्वरुप

मुखौटा लगाये अपने कुरूप मुख मंडल को छुपाये 
भ्रमित करता हुआ स्वयं को भी
और स्वयं से जुड़े मनुष्यों को भी

मुर्ख है.. .!!! जनता नहीं की शब्दकोष  में  ये  रिश्तों के अर्थ
ही हैं जिनका समानार्थक कुछ भी नहीं ,
बस एक ही मूल अर्थ है
अपना सर्वस्व निछावर करदेना
न कोई चयन ,,,न कोई लाभ की अपेक्षा ,,,
की किस रिश्ते नाते का भाव है कितना
मन का मिलना ही सर्वस्व क्यों नहीं होता??
कितना कपटी है मनुष्य !!!
इस अर्थ को समझने के लिए एक जन्म शेष नहीं ऐसा कहते है
 अदभूत विडम्बना है की  मानते  नहीं , की जीवन तो बस है एक
और इस अर्थ का कोई समानार्थक  है  कहाँ ?? ये भी तो देख .!!!!

16 May 2015

Alladin ka chirag

Its a story of a Rover - I am a photographer by profession, i used to travel all allot for my work. In between My Airtel app is just work like alladin ka chirag for me. I get best offers while recharging my airtel account at any time, any where. My Airtel app helps me to concentrate on my work in one touch even more and sometimes sleep more hours as my work schedule is very hectic. My mom says My Airtel app is just like our family members who is fulfilling our needs and helps us to recharge our internet postpaid bills in last hour in one touch. My Airtel app keep my tension away always and helped me to live my life with peace. One day I was talking to my mom while traveling to mumbai by train then suddenly she informed me that our DTH connection is flashing a message to recharge the account with in one hour to avail the services without disconnection then i open my alladin ka chirag My Airtel app and recharge my DTH account with in 30 seconds and makes my mother smile because of my Airtel app. In the age of Facebook, Whats app, Twitter, Viber and other networking sites i have to socialize allot during my work and also share important updates quickly with my firm as well however I recharged my Internet pack i received great benefits and offer every time. 

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13 April 2015

A Wanderer .....!!!

A Wanderer .....!!!

Wherever i go i find myself connected with my surroundings.  It seems there are beautiful stories inside each n every scenes i am passing through, lots n lots of hidden stories,  ready to come out of their untouched zone.  Sometime its a story of a boy whom i often see in the road side studying under a streetlamp... or a group of kids living in small tents on the pavement & singing "veer tum bhadhe chalo dheer tum badhe chalo" (a patriotic poem) or an old man carrying a basket of responsibilities on his head. I travel aimlessly people say but i wander to touch the untouched. Faces changes....even the story changes but what is constant is the CHANGE...!!!

All these undiscovered stories sometime poke me and says  i am  ready ...!!! yes ready...!!! To be a part of your stories...!!! & the best way to pen down ,Right Away Right Now. So it stimulates me to take out my ASUS Zenfone 2 smart phone & start scribbling or capturing. What drives me then is the stories.I give a dam ,weather its day or night, i m on wheels or walking  all i want to do is....!!! To capture them and make a bouquet of beautiful stories .Hence i am fully dependable on my ASUS Zenfone 2- my buddy. Whenever i have to explore these untold stories my buddy my ASUS Zenfone 2 is my trusted companion ...!!

Its power packed most incredible features makes me feel well equipped to explore my world of wandering....!!! ASUS ZenFone 2 is world’s 1st smartphone with 2GB RAM  - I can creatively do as much as scribbling I want.explore my world of creation coz it gives me the freedom ..yes a freedom to think beyond the limit. The most fantastic thing is the technology makes the battery super strong up to 60% in not more than 39 minutes, now i can fly high n high n high i feel like i can now touch the sky....!!! A perfect blend of me and my ASUS Zenfone 2 . The superb technology I know it won't stop me to touch the untouched ,we are so compatible.

ASUS Zenfone 2 PixelMaster camera, high-resolution photos with zero shutter lag, capture up to 400% brighter photos at night, low-light scenes, without the need for a flash. So who cares weather its day or night why would i wait for a perfect scene My ASUS Zenfone 2 makes every single scene a perfect scene. Ohhh I am so dependable my long lasting my trusted companion in the journey of creation. This is the best-est Smart phone I have ever experienced.

 "ASUS Zenfone 2 - My trusted companion so far, a journey with you is so meaningful ..."!!!

- From A Wanderer

http://www.asus.com/Phones/ZenFone_2_ZE551ML/.

Thank you ASUS Zenfone 2 for an opportunity to express my story..!!






http://www.asus.com/Phones/ZenFone_2_ZE551ML/.

25 March 2015

नन्ही सी मुस्कान....!!!!


मेरी ज़िन्दगी !! हाँ ज़िन्दगी चल रही थी सीधी सपाट रेल की पटरी सी दूर से देखो तो दोनों छोर जैसे  मिल  गए हों पर वास्तव  कुछ और है ......!!!

ऑफिस से घर और घर से ऑफिस , रोज़ वही सड़क, वही पेड़, वो अनजान लोग हर दिन एक ही जगह दीखते।  बस से ऑफिस जाते हुए ये मनो रोज़ का नज़ारा था ऑफिस बड़ी बोरियत सी ज़िन्दगी थी पर चैन घर पर भी कहाँ था ४-५ दिनों की लम्बी छुट्टी में  तो मनो दीवारें घूरने लगती हैं और दरवाज़ा पूछता है कब निकलोगी ?

वैसे अकेली रहती हूँ , आत्मनिर्भर हूँ , थोड़ी स्वाभीमनी भी, अपने आत्मा सम्मान से बहुत प्रेम है, तो मित्रों का चयन भी बड़े धयान से ही करती हूँ , 34 की हो गयी हूँ  , single हूँ, कुछ दिन पहले ही मिन्नी  (मेरी बचपन की दोस्त) की बेटी से मिली 6 साल की है बड़ी प्यारी जब भी जाती हूँ लिपटी रहती है मुझसे , कभी कहानी , कभी chocolate की ज़ीद , कभी न मनो तो प्यारे से आँखों में ढेर सारा आँसू  भर कर रूठ जाती , फिर तो मांग पूरी करनी थी, तो मासी  बोलकर लिपट जाती, रात भर जागती लड़ती अपनी मम्मी से की please मासी के पास सोने दो। बहुत हंसी अति मुझे और मज़ेदार बात ये की मुझे और मिन्नी को बातें ही नहीं करने देती इतनी शरारती थी। बेचारे हम एक दूसरे का चेहरा देखते और उसकी मम्मी उसे ग़ुस्से से देखती और वापस मेरी हंसी निकल जाती, फिर हम सब खिल खिला उठते।  १-२  दिन का ही जाना होता था साल में वो पंजाब में रहती थी और मैं शिमला में।  फिर जाने के दिन मिन्नी की बेटी लिपट कर आंसूं बहती , मत जाओ ना मासि  please , मैं बदमाशी नहीं करुँगी।  पगली थी पर बहुत प्यारी , उसे बहलाती फुसलाती अगली बार ढेर सरे गिफ्ट्स का प्रॉमिस कर के भारी मन से विदा होती।

उस नन्ही सी बच्ची का मोह मुझे हर साल उससे मिलने को विवश कर जाता , उसकी मुस्कान में अपने जीवन की छाँव मिलती मुझे।

कभी कभी प्रश्न उठता मन मैं जीवन में प्रेम में तो सफलता नहीं मिली, फिर विश्वास मनो काम सा गया विवाह में , अब तो उस विश्वास की कब्र भी खुद गयी है।  देखते देखते  जीवन के कई साल अकेले बिता लिए , कोई क्षोभ  नहीं है मुझे बस आश्चर्य  है !!!!

क्या जीवन मैं किसी पुरुष के होने से ही मातृत्व की इच्छा पूरी  हो सकती है ?? और अगर कोई ना मिला तो ?
जीवन के इस अध्भूत अनुभव  को क्या कभी सार्थक अर्थ  नहीं मिलेगा?  मन में एक प्रबल इच्छा ने जन्म लिया
दृढ निश्चन ने आगे बढ़ने की प्रेरणा । जीवन के इस अनुभव को मैं  मन से अपनाना चाहती  थी।  मैंने तय कर लिया - "I will become a Single Mother"...!!!

जुट गयी प्रयास में ..... और जाना की हो सकता है IVF  के माध्यम से … डॉक्टर्स से सलहा ली और उन्होंने भी ढाढस बाधाया, इस सब से पहले घर - परिवार को मानना था , दोस्तों को समझाना था की उनकी ज़रूरत है  मुझे अकेले नहीं कर सकती मैं .... मुश्किलें आयीं क्यूंकि हमारा समाज ऐसे निर्णय को स्वीकार नहीं करता और ना ही स्वागत। पर मैं कहीं गलत नहीं थी।  कहीं  भी नहीं। जीवन इस निर्णय के सामने आसान तो नहीं होगा पर मैं निकल पड़ी थी अपने मातृत्व की लालसा को पूरा करने स्वछंद , लहरों से लड़ते झगड़ते।

और आज इस निर्णय को लिए ३ साल हो गए हैं, मेरी बेटी की प्यारी सी मुस्कान मुझे उसके होने और अपने निर्णय पर गर्व का अनुभव दिलाता है।

A big Thanks to https://housing.com/.... to keep us inspiring to write....;) :) Thanks a tonnnnnn...!!!



एक सुबह की कहानी … !!!

एक सुबह की कहानी … !!!

ये कहानी एक आम सुबह की है। कुछ दिनों से ऑफिस में कुछ गरमा गर्मी मची है।   सुबह उठते ही ये ख्याल आता की जंग का एक और दिन ....!!! थोड़ी मायूस सी थी वो सुबह।  उठते ही ख्याल आया, उफ़ फिर वही मारा मरी की ज़िन्दगी ,  दुःख ,  कलेश , घृणा  से जुंजति रोजी रोटी की दुनियां। कहने को तो ऑफिस मैं काम करते हैं पर वो जगह किसी जंगल से कम नहीं , हाँ वही जंगल जहाँ हर ताकतवर जानवर छोटे और कमज़ोर जानवर को खा जाता है।
बचने  का एक ही उपाय है,  खरगोश बनना पड़ेगा, हाँ वही खरगोश जो  लोमड़ी  को अपनी बुद्धिमानी से हरा दिया करता था बचपन की उन कहानियों में। हर दिन का सफर बस से ही तय किया करती थी । कुछ खोयी खोयी सी थी मनो तूफान सा उठा हो मन में और हलचल मचा रहा है। गाने सुनते सफर अच्छा काट जाता था पर उस दिन  वो भी नहीं भा रहा था, सो खिड़की से बस यूँ ही आँखें बहार झांक रही थी।

सहसा एक दृश्य ने मुझे आकर्षित किया - " एक व्यक्ति बैसाखी लिए, हलके मैले कपडे पहने इतनी सुबह रास्ता पर करने की रख देख रहा था लगा की उसे भी कहीं जल्दी पहुंचना था", यूँ ही सवाल आया मन में - क्या काम होगा ?जो सवेरे - सवेरे निकल गया, साथ किसी को लेलेता अकेले क्यों? ऐसी क्या व्यस्तता थि ?

प्रश्न मन में लिए गाड़ी कुछ दूर चली ही थी की - " कुछ लोग बड़ी मेहनत से माथे पर गन्दा मैला लिए सुबह सुबह शेहेर साफ़ कर रहे थे, न तो उन्हें घृणा हो रही थी, ना कोई  क्षोभ , ये शायद उनके रोज़ी रोटी का उपाय था।  ये तो इनके परिश्रम की कहानी थी की इतनी सुबह सुबह वो निकल पड़े अपने जीवोपार्जन के जुगाड़ में।

मनो किसी ने झकझोड़ दिया मुझे।  आज मेरी यात्रा का ये अंतिम सिख नहीं थी कुछ कहानी और बाकि है -
"एक बूढी औरत उम्र काम से काम 75 -80 . माथे पर एक बड़ा सा टोकरा लिए कुछ बेचने निकली थी , अब धूप भी काफी तेज़ हो चली थी गर्म का महीना था , लाठी का सहारा ही था बस, मन जैसे कचोट दिया इस दृश्य ने की कैसा बेटा होगा, कैसी बहु , या पति की इन्हे इतना संघर्ष करना पड़ रहा है, या फिर क्या कोई नहीं है जो इनसे  ज़िमेदारी का बोझ लेले इस उम्र में ?

आँखें नाम सी हो गयी गयी थि। पर एक बची को देख मुस्कुरा उठी मैं  एक छोटी सी skirt , head ribbon, white shirt , अपनी माँ के साथ थी शायद बस की प्रतीक्षा कर रही थी , बच्चों की हंसी देख मनो मुग्ध हो  हूँ में, पर ये क्या ?कुछ पल बाद महसूस हुआ की वो पयरि सी बच्ची एक "special child " थी माँ का हाथ थामे  सुबह सुबह तैयार हुए बड़े उत्साह से बस की प्रतीक्षा  कर रही थी , अजीब सा सहस दे गयी मुझे उसकी भोली सी मुस्कान....!!!!

 मैं बस हंस पड़ी..... !!! सच हंस पड़ी खुद पर।  खुद के क्षोभ पर,  मेरी सुबह की मायूसी पर , मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था , भगवन की दया से सब कुछ था फिर भी मैं दुखी थी मायूस थी, जो है उसके लिए कहाँ सोचा ? जीवन के छोटी मोटी समस्या को एक विशाल काय रूप गढ़ दिया था मनो।  उस वृद्धा , वो श्रमिक , वो अपांग व्यक्ति , और उस बच्ची की मुस्कान ने मनो मेरी आँखें खोल दी।

 एक व्यंग कास गए मुझ पर और शायद जाते जाते ढाढस भी बंधा गए की लेहलों का जो डांट कर सामना कर जाये वही विजयी कहलाता है।  उसकी अस्तित्व की गाथा मनुष्य स्वयम लिखता है...... खुद गड़ता है।  जो है पास ,जो मिला है ईश्वर से, उसका सम्मान करना , समस्या का सामना करना जी जीवन है।



"A big thanks to housing.com to encourage & motivate us to write..!!! :) :)
https://housing.com/lookup.





22 March 2015

Khushiyaan...!!!


#Happinesstome  

वैसे देखा जाये तो ख़ुशी के कई रूप हैं कई रंग हैं।  हेर किसी के लिए ख़ुशी की अलग परिभाषा है।  जो पल मन को गुद - गुदा जाये वो ही ख़ुशी का माध्यम बन जाता है।  मेरे लिए ख़ुशी का न तो कोई निश्चित रंग है ना तो परिभाषा , ये तो बस एक एहसास है जो बस गुद -गुदा जाता है। 

जब चलना नहीं सीखा ,माँ ने उंगली थमी तो मुस्कुरा दिया
बाबा ने जा घोड़े की सवारी करायी तो भी मस्ती में  हंस पड़ी
भाई को जब भी चिढ़ाया तो भी मेरी ख़ुशी का अलग ही स्वाद था
दोस्तों की यारी  और बिन बात उनकी  बेहिसाब गली का भी स्वाद काफी चटकारा था
ज़नदगी  पन्नों को जब कभी भी पलटा तो खुशियों का एक अदभुत ही आनंद रहा
 यादों के  कुछ पन्नो को पलटा तो खुशियों की तिजोरी मिली , कुछ यादें अनछुई पड़ी थी
कच्चे - पके पगडंडियों से गुज़रते , कुछ खेतों में  मिलते, कुछ छुपन छुपाई के खेलों में भी दीखते,
मनो पिटारा खुल गया हो और मैं समेत रही हूँ कई यादों के गुलदस्ते।  अपनी झोली में संभाले उन्हें सहेज रही हूँ।  फिर जब बड़े हो चले तो class room की लुकचुप शरारत, बिन बात दोस्तों से झगड़ना फिर मानना ,  परिक्षा के  वो दिन ……हफ्ते दस दिन पहले पूरी ज़ोर - शोर की पढ़ाई फिर जैसे तैसे पास होजाना :) ;) अलग ही आनंद था। 
कभी लगता है ज़िन्दगी - अलग अलग फलों से भरी टोकरी सी है जिसमें छोटे-बड़े कई तरह के फल हैं ,जिसमें  छोटी - बड़ी हेर तरह की ख़ुशी के साथ ज़रूरी है।  बस हमे तय करना है किसे कब और कहाँ सजाया जाए।  तब जेक कहीं तैयार होगा.... गुलदस्ता ...!!! हाँ खुशियों का गुलदस्ता....!!!  
 मेरी खुशियों का गुलदस्ता कुछ यूँ तैयार हुआ -
मेरे बचपन का वो आंगन 
भीनी  यादों की वो खुशबू,,

अंगडाई  लेते हुए सपने 
थामे  ममता का वो दामन
कभी माँ की वो लोरी  
कभी यूँ ही मनाना 
जाके फिर रूठ जाना

कभी आखें यू मिची उन 
बदल में गूम हो जाना ,,,
तो कभी तारोंन को गिनना
चंदा मामा का आना और किस्सों का रुक जाना
खुले असमान को यू तकना
गिरते तारों को भी हो मनो लपकना 

 मेरे बचपन का वो आंगन
भीनी  यादों की वो खुशबू

वही रास्ता वही घर है
वही आंगन वही  चौबारा  
वही संध्या की है लाली 
वही सूरज का चमकना
वही चिड़ियों का चेहेकना 
मनो कल-परसों की कहानी
सब वही है और वहीँ है..
फिर भी कहीं बदली है मेरी कहानी ......

खूब याद है पढने  से जी चुराकर 
 रंग बिरंगे उन चित्रों की सैर ,, 
फिर कभी रंगों को समझना 
और उन चित्रों  को भरना 
काश रख पाती मैं गर इन रंगों की समझ 
न बदलती मेरी कहानी होती कुछ तो सेहेज

 मेरे बचपन का वो आंगन
भीनी यादों की वो खुशबू


जहाँ मैंने लड़खड़ा कर  कभी चलना था सिखा..
कभी गिर जो गयी तो फिर उठाना भी सिखा 
 सोचती हूँ खूब रोई भी होगी गिरी थी कभी जब 
फिर सोचती हूँ......!! न गिरती कभी गर उठ कहाँ पाती ज़मीं पर 
ज़िन्दगी रूकती कहाँ है ,ये कभी थकती कहाँ है
उठ खड़े  हुए जमीं पर तो क्या ..?
अब तो दौड़ना भी है बाकि ....

तब कहाँ  होगा मेरे बचपन का वो आंगन..
रह जाएगी  तो बस यादों की भीनी खुशबु .....!!!!!
 Thanks Coco-Cola India ...!!!


21 March 2015

शून्या सी.......!!!!!


है ये प्रारंभ या शेष , 

सागर के तट क्या बता सकते  हो  

तट का ये छोर तुम्हारी यात्रा का शेष है?  या प्रारंभ..?

नभ क्या तुम बता सकते हो तुम्हारे आदि और अंत की कथा?

धरा भी मौन सी.. मेरे प्रश्नों का उत्तर ना दे सकी
कष्ट, पीढा तुम तो मौन ना रहो ,
तुम्हारा होना सुखो का अंत है या

उनके आने का आभास......?
समृद्धि, वर्चस्व शांति का आगमन है या समाप्ति ?
मृत्यु आत्मा की यात्रा का अंत है या प्रारंभ....?
कई  ऐसे असीम प्रश्नों के उत्तर की खोज में मैं
शून्या सी.......!!!!!
खुद के शेहेर से दूर office trip में  निकल पड़ी थी शायद कुछ सवालों का जवाब ढूंढने रोज़ की व्यस्त ज़िन्दगी से दूर , ज़िन्दगी में  ये पहली बार था जब यूँ निकली थी.. इन 29 सालों  में  ये पहली  बार ही तो था , ज़िन्दगी इतनी तेज़ भाग रही थी की कभी-कभी रुक कर भगति दौड़ती ज़िन्दगी को देखने का अलग ही मज़ा है उसी मज़े की  तलाश में… "मैं अंशी" निकल पड़ी थी।
हँसते खेलते निकली हमारी  कार, गाते झूमते मस्ती करते सब मगन थे याद है मुझे इन सब के  बीच मैं भी खो जाती ,,,उस भगति हुयी ज़िन्दगी से थोड़ा ब्रेक मिला तो  हो ली खुदके संग।  खुद को पाने की खोज में  मानो  बही चली जा रही थी भगते दौड़ते पेड़,,, लोग,,, सब को पीछे छोड़ते मैं सफर कर रही थी खुद के साथ। … 
I was close to me, close to my friends, n very very close to the nature.. फिर रात के 11 बजे हम पहुंचे हमारे डेस्टिनेशन पर।  थके हारे  थे पर  energy down नहीं थी किसी की भी , we all were so excited होटल के रूम से कुछ आवाज़ सुनाई दे रही थी… ध्यान से सुनने  की कोशी करने लगी..... वो आवाज़ थी समादर की.…!!!! ये मेरे लिए पहली बार था जब मेरा आमना सामना होगा समादर के साथ. रात भर गप्प-शाप चली हंसी मज़ाक बहुत मज़ा आया। फिर सुबह के 4 बजे  हमने तय किया की समंदर की सैर की जाये और sunrise देखा जाये मैं भी पहुंची। ।ओर जो देखा.… देख कर  दांग  रह गयी।  आसमान में  बदल , हल्का उजाला, और ठंडी हवा समंदर का किनारा इस पार  से उस पार कुछ नहीं दिख रहा था.……  आसमान और उफान मरता समंदर और उसका शोर। मैं जैसे खो गयी दूर से टीले  पर  बैठ …चुप चाप …अकेले एक  टक  समंदर को देखने लगी। समंदर को देख  मन मैं उमड़ रहा उफान  आँखों से बरस पड़ा कब पता न चला …… i was blank totally blank..  मनो बातें कर  रही थी समंदर से जिसे पहली बार देखा था … पूछ रही थी समंदर से इतने विशाल हो क्या इतनी  गहरायी है तुम में की समां जाये मेरे कुछ दर्द बोलो ना … कब आँखों से आंसूं बहने लगे कुछ पता नहीं चला मैं जैसे होश मैं नहीं थी मनो सागर मुझे सांत्वना दे रहा हो लहरों की वो आवाज़ की हूँ में यहीं, अतह  गहरायी समेटे सामने दो, तुम्हारे सारे दुःख, दर्द, शोभ और ले जाओ उगते सूरज की लालिमा, ये शीतल हवा, भर लो अपने  अंचल में ,मैं तुम संग और तुम मुझ संग मिल कर  कुछ ज़ख्मों को भर लें चलो आओ , रो लो जी भर के की फिर मुस्कुरा सको खिल कर छोड़ जाओ  मुझ में.……  मैं समां लूँ खुद मैं........ हंस पड़ी सोच कुछ.……  अब समझी मेरे जैसे लोगों के आंसूं से तो नहीं बने हो तुम । इसलिए शायद दोनों के पानी का स्वाद खारा सा है  ।उस दिन मनो पा लिया मैन कुछ। ....... हाँ बहुत कुछ .......!!!!!


we were #together "me n the ocean....!!!!" I found something....I realize something ....within me...those moment had healed me...very auspicious moment of my life thanks https://housing.com/   [ housing.com ]
to get me into those beautiful memories once again...!!!


16 November 2013

unpleasant truth....!!!!!

It was just a normal day for me i ws on my way for office....It was childrens day.. 14th November 2013!!!
while passing the road saw some crowd wearing white cloths...flowers in hand... gathered
in front of  Nehru ji's monument.. Ohh !!!!Politician !!!!!!  Early morning they gathered
in so called sophisticated cloths..with shinning cars.. n lots of cameras moving around them..
to celebrate dis day ..... I laughed...!!!!

Yes i do have reason to laugh...n this laugh doesn't gave me any happiness .....
i laugh due to anger,,,,,due to the foolishness of ours.........

Every day when i passes through the street nearby my office...
i see small children ...yes innocent children holding books,,, doing thr homework under the lamp shades,,,
n once got some glimpse of them singing poetry saying -
'veer tum badhe chalo"
samne pahad ho singhh ki dahad ho
veer tum badhe chalo"

yes they r the street children....!!!!trying hard....very hard to become educated....!!!!

This is the truth yes truth of childrens day....n i didn't find any reason to celebrate...!!!!!!




15 November 2013

its abt the story of separation

"वृक्ष"

शब्दों के वृक्ष से झड़ चुके हों,,,उनके पत्ते जैसे ..
पतझड़ कुछ यू आया ...

शाख़ों से जुदा हुवा शब्द ..गिरे धरा पर
न जाने पतझड़ कुछ यूँ आया  ...

सुखी गर्म हवा के थपेड़ों ने शब्दों को कुछ  यूँ उखाड़ा 
बस यूँ लगा ये पतझड़ क्योँ आया ..?

जब टहनी के कन्धों पर सपनों का झुरमुट न रहा 
तो लगा ये पतझड़ फिर क्योँ आया ..?

वृक्ष के तले न तो कोई छाया है न तो कोई झुला 
है तो बस  पत झड़ के सूखे पत्ते और गर्म हवा...!!!

(its abt the story of separation)

http://shunya-si.blogspot.in/

17 July 2013

Raftaar.......!!!!!

Abhi abhi nikli hun usi ped keniche khadi thi...shaam ko suraj gehra gulabii lag raha haii bahut hi sunder....  bus ne bhi apni raftar pakad li hai her padaw ko chodte hua apne padaw ki or bhadhta jaa raha haii  kitni jaldi hai loutne ki sabko.... panchiii,, hum insaan hum sab ko....
 Chote chote bachee jhoond main.... ek chocolate ki chamak unke cehree per... masum se bachee unhe koi jaldi nahi lutne kii hahaa.......
howrah bridge, hazaron loog, isi beech..... ek pagal fate kapdoon  main .....chala ja raha ha shayad use bhi to kahin pahunch na hai bus chale ja rahe hain kaahin to pahunch na hai,chamakti roshniii button si her imarat main Kya bAat hai can see the life passing by, nadiii ki thandii hawaaa Or dur se chand sabko ghoortaaa her koi chalee ja rahaa hai....koi basta taange.... koi gathriii....... 

koi zimmedari ki tokkriii  liye...chalee ja rahe hain.... Station ki train wo bhi chootne wali hai zoor ki cityyyyy bajiii nikal padne ka isharaaa kerti huyii gadi ne fir apni raftar pakdi or hichkole khati uchalti fandti nikal rahi hai
Cycle ki ghantiii..... motar ki horn...
her gadi ke piche lal batti per saab baadhh rahe hain.....
ab mera gaaon shuru ho gayaaa ....
chote chote dhabe bahar bichiii coukiii
ye nazara shaher main kahan hogaa
Andheri galiyaan
Chote chote dukannoon main jaldi dhibrriii
Niche ek dadaji lalten main kai sawal ka jawab dhoond rahe hain 

jis bus main baithi hun...Bahut sundar hari batti se sajjii kinare tunni light bilkul khali si ye meri bus...
purane napasand gane haha fir bhi sunna pad raha haiii hehee
Lambhi line bus kiii .........

ab neend arahi hai....
per kuch khayal ata hai.......

Log wahi dekhte hain jo dekhna chate hain per mujhe ishwar wo dikha jata hai jo wo chood jate hain
Isliye main wo nahi dekhpatiii
aaj pehle ki tarhaaa chaaand main battain hongiii

 Aaj fir ek baar us azad panchi ko bitte dino ka vasta dedungi
dekhun atta hai ya nahiiiii............!!!!!!!!!!

21 February 2013

निश्चय.....


 

जीवन के ये रिश्ते ये नाते

क्या हम इन्हें हैं निभा पाते??
ये कैसा है सवाल?

क्या होगा इसका कोई जवाब?
मेरे हर जवाब मैं है एक सवाल
और हर सवाल में उसका जवाब

क्या पाया और क्या खोया मैंने जीवन में
और क्या पाने की इच्छा है मन में
हाँ प्यार पा कर विश्वास खोयां है

इस विश्वास का साथ और साथी का हाथ
पाने की इच्छा है मन में
जानती हूँ कुछ भी नहीं निश्चित जीवन मैं
पर हार ना मानूंगी ये निश्चय है मन मैं....
ये निश्चय है मन में.......... 

वर्षा.....



बदरा ने आज फ़िर ली अंगडाई
बरखा फ़िर आज लौट आई
फ़िर ज़ोर की गर्जन कानों तक आई
जैसे बदरा ने बरखा को आवाज है लगायी

दोनों के मन मे एक ही आस
मिलन की बेला मे बुझ जाए ये प्यास

पल पल जला हूँ बिरहा की अग्नि मे
मैं भी कुछ ऎसी थी उस अनजाने से नगरी मे

न भूख थी न प्यास थी तो बस मिलने की आस
कहने को सब पर हूँ मैं बरसती
पर केवल तुमसे मिलने को ही हूँ मैं तरसती

बरखा ने जब यह व्यथा सुनाई
बदरा की भी आंखे भर आयी
गरज उठा बदरा यह देख
बरस पड़ी बरखा यह देख

दोनों ने व्याकुल मन से व्यथा सुनाई
तभी तो वर्षा इस धरती पर आई

29 October 2012

विद्रोह


विद्रोह

छलक कर अखियों के मोती
जब सुख चुके होंगे...तब होगा विद्रोह...
औरों के भीड़ मे अपने अस्तित्व को जब,
 ना पाने का हो आभास तब होगा विद्रोह.....
जब सूरज की लालिमा भी मन के अन्धकार
को उज्जवल न केर पाए तब होगा विद्रोह.....
कभी सुन पाए गर अपने अंतर्धवानी को
तब कहीं होगा विद्रोह.....

सुख शांति की कामना लिए
जब मन अडिग हो
अपने कर्मों पर अथाह विश्वास हो
और ह्रदय में सत्य का वास हो 
तब कहीं हो पाए गा विद्रोह..................!!!!!!!!

23 September 2012

मेरे बचपन का वो आंगन


मेरे बचपन का वो आंगन 


मेरे बचपन का वो आंगन 
भीनी  यादों की वो खुशबू,,

अंगडाई  लेते हुए सपने 
थामे  ममता का वो दामन
कभी माँ की वो लोरी  
कभी यूँ ही मनाना 
जाके फिर रूठ जाना


कभी आखें यू मिची उन 
बदल में गूम हो जाना ,,,
तो कभी तारोंन को गिनना
चंदा मामा का आना और किस्सों का रुक जाना
खुले असमान को यू तकना
गिरते तारों को भी हो मनो लपकना 

 मेरे बचपन का वो आंगन
भीनी  यादों की वो खुशबू

वही रास्ता वही घर है
वही आंगन वही  चौबारा  
वही संध्या की है लाली 
वही सूरज का चमकना
वही चिड़ियों का चेहेकना 
मनो कल-परसों की कहानी
सब वही है और वहीँ है..
फिर भी कहीं बदली है मेरी कहानी ......

खूब याद है पढने  से जी चुराकर 
 रंग बिरंगे उन चित्रों की सैर ,, 
फिर कभी रंगों को समझना 
और उन चित्रों  को भरना 
काश रख पाती मैं गर इन रंगों की समझ 
न बदलती मेरी कहानी होती कुछ तो सेहेज

 मेरे बचपन का वो आंगन
भीनी यादों की वो खुशबू


जहाँ मैंने लड़खड़ा कर  कभी चलना था सिखा..
कभी गिर जो गयी तो फिर उठाना भी सिखा 
 सोचती हूँ खूब रोई भी होगी गिरी थी कभी जब 
फिर सोचती हूँ......!! न गिरती कभी गर उठ कहाँ पाती ज़मीं पर 
ज़िन्दगी रूकती कहाँ है ,ये कभी थकती कहाँ है
उठ खड़े  हुए जमीं पर तो क्या ..?
अब तो दौड़ना भी है बाकि ....

तब कहाँ  होगा मेरे बचपन का वो आंगन..
रह जाएगी  तो बस यादों की भीनी खुशबु .....!!!!!

मनुष्य सुख-दुःख का व्यापारी


"मनुष्य सुख-दुःख का व्यापारी"

मनुष्य सुख-दुःख का व्यापारी 
हेर चीज़ यहाँ पर बिकती है 
सुख यहाँ है कितनी सस्ती  ..
शर्त यही है...हाँ हाँ !!! शर्त यही है
सुख पाना है तो दुःख देना होगा 
मोल लगाओ बस सही मोल लगाओ
जीवन के इस मंडी में


मनुष्य सुख-दुःख का व्यापारी 
हेर चीज़ यहाँ पर बिकती है 

कभी पैसे से ,कभी सपनो से, कभी अपनों से ,
कभी दूजों से तो कभी शब्दों से,
मोल लगाओ बस सही मोल लगाओ
जीवन के इस मंडी में...

समझ न सका जीवन का मोल 
और बेच दिया सुख को दुःख के बठखरे से तोल,
घेर लौट गया जब सब कुछ वह तोल
हंस न सका... रो भी न सका 
जब देखा अपने बटवे को खोल

एक चवन्नी भी न थी,,न थे कोई सपने,,
और न थे कोई अपने..और न ही कोई पराये..
सब कुछ गवां चूका था...दाव पर सब कुछ लगा चूका था..
हर गया सब...हर गया.....

हेर चीज़ यहाँ कब बिकती है??
सुख का न कोई मोल,
उसे किसी तराजू से न तोल

मनुष्य तू सुख सुख दुःख का व्यापारी नहीं...
हेर चीज़ यहाँ पर बिकती नहीं...
तू न मोल लगा...
अब और ना मोल लगा....
जीवन है कोई मंडी नहीं.... !!!

निःशब्द


निःशब्द 

शब्दों से मेरी ये द्वन्द 
जाने कब से छिड़ी है
हाँ शब्दों से मेरी ये द्वन्द
ना जाने क्यूँ ये छिड़ी है
मेरे ही शब्दों से मेरी ये जंग

जब कभी जग ने साथ है मेरा छोड़ा 
ये शब्द ही तो थे जो हमेशा पास रहे मेरे
मेरे कलम की नोक बन करर हेर पल
साथ रही मेरे..

तो फिर क्यूँ  रूठ गए है मुझसे
मेरे ही अपने शब्द 

नदी की विपरीत दिशा में
बह रही हूं ....हाँथ बढ़ाये जग से वैसे भी कोई आस नहीं 
मेरे शब्द तू  ही आजा शब्दों की नव सी बना 
चल ले चल पार मुझे कहीं
दूर बहुत दूर मुझे ले चले तुए अपने संग 
इस नगर से कहीं दू बहुत दूर 

तू ही सुख तुए ही प्रिय 
तुए ही प्रतिबिम्ब तू ही प्रिय 
तू ही उजागर करे मेरी हर व्यथा 
मेरी हर कथा , तू ही मेरा प्रयास 
और तू ही मेरा पुरस्कार 
देख खड़ी में शब्दों के इस पार
हाँथ बढाए...
अब ना रूठ  साँझ भी हो चली
ले चल मुझे अब चल पार करा दे
मुझे जाना है मुझे शब्द के उस पार.......

मेरे आंगन का वो पौधा

                                                  मेरे आंगन का वो पौधा
कई वर्षों से जो था जन्मा
कुछ पत्ते भी थे जिनमें
आधी -सुखी डाली से यूं लटके
                                           
ना वो बढ़ता
ना वो मरता
ना जाने क्यों ठूँठ सा वो खड़ा था
पर  फिर भी साँस भी थी कहीं बाकि

वो था मेरे ही आंगन का पौधा

कई ऋतुएँ आयी-गयी थीं
ना तो कोई हलचल हुई थी 
फिर भी वो स्थिर सा खड़ा था
था तो बस माटी का सहारा

ऐसा था मेरे आंगन का वो पौधा 

कई बार कोसा उसे मैंने 
कई बार रखा भी  प्यासा
मगर वह जिद्दी बड़ा था
तन के फिर भी जिन्दा खड़ा था
साथ जन्में थे और भी पौधे ,जो की बड़े फुले - फले थे
पर फिर भी किसी संवेदना से परे थे 

कुछ यूं था मेरे आंगन का वो पौधा

एक दिन मेरी ऑंखें खुली जब'
देख दांग उसे रह मैं गयी तब
एक नन्ही सी कलि  मुख बढ़ाये थी खड़ी
नन्ही कुछ कोपल भी थे निकले
हलके हरे रंगों के चादर को समेटे
देख उसे मनो फुले ना समायी

है ये वही पौधा जो मेरे आंगन मैं बढा था

कुछ इशारा  किया फिर मुझे उसने
तब कहीं मैं ये समझा पाई 
की माना कई ऋतुएँ थी गुजरी 
फिर भी सावन का आना था बाकि
आज वही सावन है आया
जिसकी बूंदों ने उस सूखे पौधे को था जगाया
ये देख मेरी बस ऑंखें भर आयी
आज कुछ तो सीख मैंने उस नन्हे पौधे से थी पाई...

16 September 2012

शुन्य सी.....

शुन्य सी --


है ये प्रारंभ या शेष , 
सागर के तट क्या बता सकते  हो  
तट का ये छोर तुम्हारी यात्रा का शेष है? 
या प्रारंभ..?
नभ क्या तुम बता सकते हो तुम्हारे आदि और अंत की कथा?
धरा भी मौन सी.. मेरे प्रश्नों का उत्तर ना दे सकी

कष्ट, पीढा तुम तो मौन ना रहो , 
तुम्हारा होना सुखो का अंत है या 
उनके आने का आभास......?
समृद्धि, वर्चस्व शांति का आगमन है या समाप्ति ?
मृत्यु आत्मा की यात्रा का अंत है या प्रारंभ....?
कई  ऐसे असीम प्रश्नों के उत्तर की खोज में मैं
शून्या सी.......!!!!!